A small poem from my old #diary ...habit of writing poems during exam preparations in school time...
जज्बातों के परिंदे
है वह एक ऐसा एहसास
जिसका कोई रूप नहीं
ना कोई रंग है।
दुनिया को करता है रंगीन
है इसमें कुछ तो ख़ास।
क्या इसे वही कहते हैं
जिसकी कठपुतली है इंसान।
भड़क जाए तो आंधी
पिघले तो मोम।
स्त्री हो या पुरुष हर वक़्त
इसी के वश में रहते हैं।
चैन में, आराम में रहता साथ
मेरे कोमल मन को
करीब से जानने वाला
कोई और ना समझे
पर मुझे सबसे जयादा समझने वाला
मेरा दोस्त मेरा ख़ास
मेरे मन के भाव
यही हैं मेरे जज्बात।
हर तरफ जज्बातों के घरोंदे है।
हर कोई इसी में खुश
तो कोई दुखी है।
कोई व्यक्त करते हैं।
तो कोई मन में रखते हैं।
क्योंकि इंसान और कुछ नहीं,
जज्बातों के परिंदे हैं।
#श्रुति सिंह